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पुराणों में पृथ्वी का विभाजन

लेखक

प्रभात कुमार

पुराणों में पृथ्वी का विभाजन

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श्रीपराशर ऋषि द्वारा प्रणीत यह पुराण अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तथा प्राचीन है। इसके प्रतिपाद्य भगवान विष्णु हैं, जो सृष्टि के आदिकारण, नित्य, अक्षय, अव्यय तथा एकरस हैं। इस पुराण में आकाश आदि भूतों का परिमाण, समुद्र, सूर्य आदि का परिमाण, पर्वत, देवतादि की उत्पत्ति, मन्वन्तर, कल्प-विभाग, सम्पूर्ण धर्म एवं देवर्षि तथा राजर्षियों के चरित्र का विशद वर्णन है। विष्णु पुराण के अनुसार यह पृथ्वी सात द्वीपों में बंटी हुई है। ये सातों द्वीप चारों ओर से सात समुद्रों से घिरे हैं। ये सभी द्वीप एक के बाद एक दूसरे को घेरे हुए बने हैं, और इन्हें घेरे हुए सातों समुद्र हैं। इक्षुरस का सागर प्लक्षद्वीप को घेरे हुए है। इस सागर को शाल्मलद्वीप घेरे हुए है।

'जम्बूप्लक्षाहृदयौ द्वीपौ शाल्मलश्चापरो द्विज, कुश: क्रौंचस्तथा शाक: पुष्करश्चैव सप्तम:                              [विष्णु पुराण 2,2,5]

शाल्मल द्वीप के सात वर्ष - श्वेत, हरित, जीमूत, रोहित, वैद्युत, मानस और सुप्रभ माने गये हैं।

इक्षुरस का समुद्र इसको परिवृत करता है। -

शाल्मलेन समुद्रौऽसौ द्वीपनेक्षुरसोदक:'      [विष्णु पुराण 2,4,24।]

इसके सात पर्वत हैं - कुमुद, उन्नत, बलाहक, द्रोणाचल, कंक, महिष, कुकुद्मान।

इस की सात ही नदियाँ, जिनके नाम हैं- योनि, तोया, वितृष्णा, चंद्रा, मुक्ता, विमोचनी और निवृति।

इसमें कपिल, अरुण, पीत और कृष्ण वर्ण के लोग रहते हैं। -

'कपिलाश्चारुणा: पीता: कृष्णाश्चैव पृथक पृथक'        [विष्णु पुराण 2,4,30।]

 

शाल्मलि के एक महान वृक्ष के यहाँ स्थित होने के कारण इस महाद्वीप को शाल्मल कहा जाता है -

'शाल्मलि: सुमहान वृक्षो नाम्ना निवृतिकारक:'          [विष्णु पुराण 2,4,33।]

शाल्मल को महाभारत के भीष्मपर्व, 11, 3 में शाल्मलि कहा गया है -

'शाल्मलिं चैव तत्वेन क्रौंच्द्वीपं तथैव च।

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