| Hindi Literature | हिन्दी के कवि | |
हिन्दी के कवि वृंद (1643-1723 ई.) वृंद का जन्म बीकानेर में सेवक जाति के परिवार में हुआ था। इन्होंने काशी में साहित्य तथा दर्शन की शिक्षा प्राप्त की थी। ये पहले औरंगजेब तथा उसके पुत्र अजीमुश्शाह के कृपापात्र रहे, बाद में ये गुसाईंजी के शिष्य हो गए। वृंद के नीति विषयक दोहे बहुत सुंदर हैं तथा गाँवों में भी खूब प्रचलित हैं। इनकी 11 रचनाएँ प्राप्त हैं, जिनमें 'वृंद-सतसई, 'पवन-पचीसी, 'शृंगार-शिक्षा तथा 'हितोपदेश मुख्य हैं। 'वृंद-सतसई इनकी सर्वाधिक प्रसिध्द रचना है, जो नीति साहित्य का शृंगार है। दोहे करत-करत अभ्यास ते, जडमति होत सुजान। जो पावै अति उच्च पद, ताको पतन निदान। जो जाको गुन जानही, सो तिहि आदर देत। उत्तम विद्या लीजिए, जदपि नीच पै होय। मनभावन के मिलन के, सुख को नहिंन छोर। सरसुति के भंडार की, बडी अपूरब बात। निरस बात सोई सरस, जहाँ होय हिय हेत। ऊँचे बैठे ना लहैं, गुन बिन बडपन कोइ। उद्यम कबहुँ न छोडिए, पर आसा के मोद। कुल कपूत जान्यो परै, लखि-सुभ लच्छन गात। मोह महा तम रहत है, जौ लौं ग्यान न होत। कछु कहि नीच न छेडिए, भले न वाको संग। अपनी पहुँच बिचारि कै, करतब करिये दौर। बुरे लगत सिख के बचन, हिए बिचारो आप। फेर न ह्वैहैं कपट सों, जो कीजै ब्यौपार। नैना देत बताय सब, हिय को हेत अहेत। अति परिचै ते होत है, अरुचि अनादर भाय। भले बुरे सब एक से, जौं लौं बोलत नाहिं। सबै सहायक सबल के, कोउ न निबल सहाय। अति हठ मत कर हठ बढे, बात न करिहै कोय।
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