| Hindi Literature | हिन्दी के कवि | |
हिन्दी के कवि वाजिद (17वीं शताब्दी) वाजिद जाति के पठान थे, किन्तु हिंदू हो गए थे। कहते हैं एक बार ये शिकार खेलने गए और हिरणी पर तीर चलाने वाले थे कि हृदय में करुणा का संचार हुआ और मन की वृत्ति बदल गई। गुरु के हेतु व्याकुल हुए। दादू दयाल ने कृपा कर इन्हें अपना लिया। उनके 52 पट्टशिष्यों में इनकी भी गणना है। इनके 'उत्पत्तिनामा, 'प्रेमनामा, 'गरमनामा आदि छोटे-छोटे 14 ग्रंथ प्राप्त हैं। ये रचनाएँ 'पंचामृत नाम से संग्रहित हैं। अरिल्ल, दोहे और चौपाई इनके प्रिय छंद हैं। इनकी रचना में प्रभु और गुरु की कृपा से निर्मल जीवन जीने के उपदेश हैं। पद
कमल गया कुमलाय कल्याँ भी जायसी। चटक चाँदणी रात बिछाया ढोलिया। कोयल सबद सुणाय रामरस लेत है। हरिजन बैठा होय तहाँ चल जाइये। परिहरिये वह ठाँव भगति नहिं राम की। सतगुरु शरणें आयक तामस त्यागिये। उठ लाग्या में राड, राड में मीच है। बडा भया सो कहा बरस सौ साठ का। छापा तिलक बनाय कमंडल काठ का। देह गेह में नेह निवारे दीजिये। रह्या न बेसी कोय रंक अरु राव रे। नहिं है तेरा कोय नहीं तू कोय का। मेरी-मेरी मान फिरत अभिमान में। केते अर्जुन भीम जहाँ जसवंत-से। जिनकी सुन-सुन हाँक महागिरि फाटते। कुंजर-मन मद-मत्त मरै तो मारिये। हरि भक्तन सों नेह पलै तो पालिये। एकै नाम अनंत किँके लीजिये। ले कर चिनगी आन धरै तू अब्ब रे!
|