| Hindi Literature | हिन्दी के कवि | |
हिन्दी के कवि परमानंददास (1493-1583 ई.) परमानंददास अष्टछाप के अत्यंत प्रतिभा संपन्न कवि थे। ये कन्नौज के कान्यकुब्ज ब्राह्मण थे। इनके पिता बडे निर्धन थे। जनश्रुति है कि इनके जन्म के दिन किसी धनी सेठ ने इनके पिता को प्रचुर दान दिया जिससे उन्हें परम आनंद हुआ। इसी से उन्होंने अपने पुत्र का नाम परमानंद रख दिया। ये बालपन से ही भगवत् भक्त थे। पद मैया मोहिं ऐसी दुलहिन भावै। का गोप की तनक ढोठिनियाँ,रुनक झुनक चलि आवै॥ कर-कर पाक रसाल आपने कर मोहिं परसि जिमावै। कर अंचर पट ओट बबातें, ठाढी ब्यार ढुरावै॥ मोहिं उठाय गोद बैठारै, करि मनुहार मनावै। अहो मेरे लाल कहो बाबा तें, तेरो ब्याह करावै। नंदराय नंदरानी देउ मिलि, मोद समुद्र बढावै। 'परमानंददास को ठाकुर, बेद विमल जस गावै॥
ब्रज के बिरही लोग बिचारे। बिन गोपाल ठगे से ठाढे अति दुरबल तन हारे॥ मात जसोदा पंथ निहारत निरखत साँझ सकारे। जो कोइ कान्ह-काह कहि बोलत ऍंखियन बहत पनारे॥ यह मथुरा काजर की रेखा जे निकसे ते कारे। 'परमानंद स्वामि बिनु ऐसे ज्यों चंदा बिनु तारे॥
कौन रसिक है इन बातन कौ। नंद-नंदन बिन कासों कहिये, सुन री सखी मेरो दु:ख या मन कौ। कहँ वह जमुना पुलिन मनोहर, कहँ वह चंद सरद रातिन कौ। कहँ वह मँद सुगंध अमल रस, कहँ वह षटपद जलजातन कौ। कहँ वह सेज पौढिबो बन को, फूल बिछौना मदु पातन कौ। कहँ वह दरस परस 'परमानंद कोमल तन कोमल गातन कौ॥
बृंदावन क्यों न भए हम मोर। करत निवास गोबरधन ऊपर, निरखत नंद किशोर। क्यों न भये बंसी कुल सजनी, अधर पीवत घनघोर। क्यों न भए गुंजा बन बेली, रहत स्याम जू की ओर॥ क्यों न भए मकराकृत कुण्डल, स्याम श्रवण झकझोर। 'परमानंद दास को ठाकुर, गोपिन के चितचोर॥
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