| Hindi Literature | हिन्दी के कवि | |
हिन्दी के कवि मतिराम (1617-1736 ई.) मतिराम ब्रजभाषा काव्य के मधुरतम कवि हैं। ये भूषण, चिंतामणि और नीलकंठ के भाई थे। ये सभी कवि थे। मतिराम के चार ग्रंथ प्रसिध्द है- 'फूल-मंजरी, 'ललित-ललाम, 'मतिराम-सतसई तथा 'रसराज। फूल मंजरी के हर दोहे में एक फूल का वर्णन है। ललित ललाम में ऐतिहासिक तथा सतसई में शृंगार एवं नीति के दोहे हैं। रसराज इनका उत्कृष्ट ग्रंथ है, जो रसिकों का कंठहार रहा है। इसमें प्रेम की विविध चेष्टाओं के मनोहारी दृश्य प्रस्तुत किए गए हैं। पद प्रान पियारो मिल्यो सपने मैं, परी जब नैंसुक नींद निहोरैं। यों 'मतिराम भयो हिय मैं सुख, बाल के बालम सों दृग जोरैं।
कुंदन को रँगु फीको लगै, झलकै अति अंगन चारु गुराई। को बिन मोल बिकात नहीं, 'मतिराम कहै मुसकानि मिठाई।
जा दिन तैं छवि सौं मुसुकात, कँ निरखे नंदलाल बिलासी। नेकु निमेष न लागत नैन, चकै चितवै तिय देव-तिया सी।
केलि की राति अघाने नहीं, दिनँ मैं लला पुनि घात लगाई। जेठी पठाई गई दुलही, हँसि हेरि हिये 'मतिराम बुलाई।
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