| Hindi Literature | हिन्दी के कवि | |
हिन्दी के कवि भूषण (1613-1715 ई.) भूषण का जन्म कानपुर जिले के तिकवापुर ग्राम में हुआ था। ये कान्यकुब्ज ब्राह्मण थे। कहते हैं भूषण निकम्मे थे। एक बार नमक मांगने पर भाभी ने ताना दिया कि नमक कमाकर लाए हो? उसी समय इन्होंने घर छोड दिया और कहा 'कमाकर लाएंगे तभी खाएंगे। प्रसिध्द है कि कालांतर में इन्होंने एक लाख रुपए का नमक भाभी को भिजवाया। हिन्दू जाति का गौरव बढे और उन्नति हो यह इनकी अभिलाषा थी। इस कारण वीर शिवाजी को इन्होंने अपना आदर्श बनाया तथा उनकी प्रशंसा में कविता लिखी। चित्रकूट नरेश के पुत्र रुद्र सोलंकी ने भी इनकी कविता सराही और इन्हें 'भूषण की उपाधि दी। इनके प्रसिध्द ग्रंथ हैं- 'शिवराज भूषण, 'शिवा बावनी तथा 'छत्रसाल-दशक, जिनमें वीर, रौद्र, भयानक और वीभत्स रसों का प्रभावशाली चित्रण है। 'भूषण रीतिकाल के एकमात्र कवि हैं, जिन्होंने शृंगारिकता से हटकर वीरता और देशप्रेम के वर्णन से कविता को गौरव प्रदान किया। पद इन्द्र जिमि जंभ पर, बाडब सुअंभ पर, पौन बारिबाह पर, संभु रतिनाह पर, दावा द्रुम दंड पर, चीता मृगझुंड पर, तेज तम अंस पर, कान्ह जिमि कंस पर, ऊंचे घोर मंदर के अंदर रहन वारी, कंद मूल भोग करैं, कंद मूल भोग करैं, भूषन शिथिल अंग, भूषन शिथिल अंग, 'भूषन भनत सिवराज बीर तेरे त्रास, छूटत कमान और तीर गोली बानन के, ताही समय सिवराज हुकुम कै हल्ला कियो, 'भूषन भनत तेरी हिम्मति कहां लौं कहौं ताव दै दै मूंछन, कंगूरन पै पांव दै दै, बेद राखे बिदित, पुरान राखे सारयुत, हिंदुन की चोटी, रोटी राखी हैं सिपाहिन की, मीडि राखे मुगल, मरोडि राखे पातसाह, राजन की हद्द राखी, तेग-बल सिवराज,
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